दर्द कागज़ पर ...

*दर्द कागज़ पर,*
          *मेरा बिकता रहा,*
*मैं बैचैन था,*
          *रातभर लिखता रहा..*

*छू रहे थे सब,*
          *बुलंदियाँ आसमान की,*
*मैं सितारों के बीच,*
          *चाँद की तरह छिपता रहा..*

*दरख़्त होता तो,*
          *कब का टूट गया होता,*
*मैं था नाज़ुक डाली,*
          *जो सबके आगे झुकता रहा..*

*बदले यहाँ लोगों ने,*
         *रंग अपने-अपने ढंग से,*
*रंग मेरा भी निखरा पर,*
         *मैं मेहँदी की तरह पीसता रहा..*

*जिनको जल्दी थी,*
         *वो बढ़ चले मंज़िल की ओर,*
*मैं समन्दर से राज,*
         *गहराई के सीखता रहा..!!*
  
                  

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