तमाशा !

सड़कों पे चेहरों को देखा,
रंग रंगायन ये संसार लगा,
बहती  देखी सीधी सादगी,
गर्व दम्भित अहंकार लगा ।

कभी उफनती साँसों से,
धूल धूसरित  गुबार लगा,
कभी उतरे चेहरों में डूबा
शख्स बड़ा बेज़ार लगा ।

कभी मंद मुस्कान खिली
मद्दम गुलाल लाल लगा,
हंसी ठहाके में लिपटा
आनंदित ये संसार लगा ।

कभी सिसकती साँसों में
घुटता जीवन सार लगा,
कभी ख़ुशी के आंसू देखे
लगता ये बेड़ा पार लगा ।

मनुहार में हुए गोल ओंठ,
निर्झर रिसता प्यार लगा,
कभी मायूसी की परतों में,
लिपटा दुःख संचार लगा ।

काल, कटुता के बादल,
घुमड़ा ये आकाश लगा,
मान मुनौवाल सा करता
मृदु मन का विस्तार लगा ।

मन की बाते सामने रखता
दर्पण या प्रतिबिम्ब लगा
लगा कभी पाषाण हॄदय ये
कभी नीरस निष्प्राण लगा ।

निरंजन धुलेकर ।

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