उसको एक नजर क्या देखा ......

उसको एक नजर क्या देखा नजर उसी पर गई ठहर।
मुझको होश रहा ना अपना दिल में ऐसी उठी लहर।

आजतलक ना देखी थी इसकदर हंसी सूरत कोई ,
एक झलक भर दिखला कर वह थी ना जाने गई किधर।

जिसदम आँचल उड़ा हवा में छूकर उसका जिस्म ज़रा ,
भीनी भीनी सी इक खुशबू शोख फिजां में गई बिखर।

उसके बिना नहीं लगता है कुछ भी अच्छा इस  दिल को,
बेचैनी बढ़ती  जाती है उसकी मिलती नहीं खबर।

रह रह कर मन में आता है फिर  उसका दीदार करूँ ,
पर लगता है लिए आरजू कट ना जाए कहीं उमर।

मुझे पता है यह तो  केवल खाब हंसी मेरी आँखों का ,
वह मेरा हमसफ़र बने फिर  ख़त्म नहीं हो कभी सफर।

कैसा ये दीवानापन है कैसी ये बेखुदी मेरी ,
उसके अहसासों का मुझ पर तारी जाता नहीं असर।

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