दर्द बांटने से बटता है;

दर्द बांटने  से बटता है;
सफ़र आसाँ कटता है।

मतलबों से तो ही यहां;
किसी पे कोई मरता है।

अपनी-अपनी फ़िक़्र है;
किसके लिये कौन करता है।

सफ़र में चला हूं अकेला;
साथ मगर कौन चलता है।

ख़ुद में ही ढूंढो तुम ख़ुशी;
दिल्लगी अब कौन करता है।

आईना भी ख़ामोश है इतना;
तुमसा यहां कौन संवरता है।

किसे मिल जाये ज़रा ख़ुशी;
तो तुम्हारा क्या बिगड़ता है।

ज़िंदगी किधर जा रही है तू;
भीड़ में आदमी तनहा दिखता है।

एक दो दिन की अज़ीयत नहीं;
मज़बूर जीना भी यहां पड़ता है।

ग़म तो सभी को आने हैं, मगर
ख़ुशी में देखो हर कोई मरता है।

भाईयों ने की है खड़ी बीच अपने;
दीवार को बदनाम ज़माना करता है।

किस क़दर ज़ख़्म ज़ख़्म चेहरा है;
चांद भी आदमी सा लगता है।

दिल के तो क़रीब तुम हो ही मेरे;
मेरे दिल में तुमसा ख़ुदा बसता है।

दिल तो  तुमपे आया है "
ना जाने क्या तुमसे मेरा रिश्ता है।
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