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WHEN TO BE SILENT

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🌷WHEN TO BE SILENT 🌷

1.  Be silent - in the heat of anger.
2.  Be silent - when you don't
     have all the facts.
3.  Be silent - when you
     haven't verified the story.    
4.   Be silent - if your words will offend a weaker person.                                          5.  Be silent - when it is time
     to listen.
6.  Be silent - when you are
     tempted to make light of
     holy things.
7.  Be silent - when you are
     tempted to joke about
     sin.
8.  Be silent - if you would be
     ashamed of your words
     later.                                         
9.  Be silent - if your words
     would convey the wrong
     impression.
10. Be silent - if the issue is
      none of your business.
11. Be silent - when you are
      tempted to tell an
      outright lie.
12. Be silent - if your words
      will damage someone
      else's reputation.
13. Be silent - if your words
      will damage a friendship.
14. Be silent - when you are
      feeling critical.
15. Be silent - if you can't 
      say it without screaming.
16. Be silent - if your words
      will be a poor reflection
      of the Lord or your
      friends and family.
17. Be silent - if you may  
       have to eat your words
       later.
18. Be silent - if you have
       already said it more
       than one time.
19. Be silent - when you are
      tempted to flatter a
      wicked person.
20. Be silent - when you are
      supposed to be working
      instead.

WHOEVER GUARDS HIS MOUTH AND TONGUE KEEPS HIS SOUL FROM TROUBLE!!!!!

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रोशनी चाही थी, आग लगा दी किसने

रोशनी चाही थी, आग लगा दी किसने
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चोटों पे चोट देते ही जाने का शुक्रिया
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दीवारों, मेरी राह में आने का शुक्रियाआँसू-सा माँ की गोद में आकरसिमट गया
नज़रों से अपनी मुझको गिराने का शुक्रियाअबयहहुआ कि दुनिया ही लगती है मुझको घर
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यहबात है तो सारे ज़माने का शुक्रियाअब मुझको आ गए हैं मनाने के सबहुनर
यूँ मुझसे `कुँअर' रूठ के जाने का शुक्रिया...

एक शिक्षाप्रद लघु दृष्टांत।

किसी राजा के पास एक बकरा था। एक बार उसने एलान किया की जो कोई इस बकरे को जंगल में चराकर तृप्त करेगा मैं उसे आधा राज्य दे दूंगा।किंतु बकरे का पेट पूरा भरा है या नहीं इसकी परीक्षा मैं खुद करूँगा।इस एलान को सुनकर एक मनुष्य राजा के पास
आकर कहने लगा कि बकरा चराना कोई बड़ी बात नहीं है।वह बकरे को लेकर जंगल में गया और सारे दिन उसे घास चराता रहा,, शाम तक उसने बकरे को खूब घास खिलाई और फिर सोचा की सारे दिन इसने इतनी घास खाई है। अब तो इसका पेट भर गया होगा तो अब इसको राजा के पास ले चलूँ,,बकरे के साथ वह राजा के पास गया,, राजा ने थोड़ी सी हरी घास बकरे के सामने रखी तो बकरा उसे खाने लगा।इस पर राजा ने उस मनुष्य से कहा की तूने उसे पेट भर खिलाया ही नहीं वर्ना वह घास क्यों खाने लगता।बहुत जनो ने बकरे का पेट भरने का प्रयत्न किया किंतु ज्यों ही दरबार में उसके सामने घास डाली जाती तो वह फिर से खाने लगता।एक विद्वान् ब्राह्मण ने सोचा इस एलान का कोई तो रहस्य है, तत्व है,,मैं युक्ति से काम लूँगा,, वह बकरे को चराने के लिए ले गया। जब भी बकरा घास खाने के लिए जाता तो वह उसे लकड़ी से मारता,, सारे दिन में ऐसा कई बार हुआ,, …