तुम्हारे कमरे की खिड़की से बहुत साफ़ दिखती थी

तुम्हारे कमरे की खिड़की से
बहुत साफ़ दिखती थी
कुछ पहाड़ियाँ,
जिन्हें अक्सर
तकते रहते थे तुम,
जब कभी अकेले होते थे।

हमारी मुलाक़ातों का सिलसिला
गुज़र जाने के बाद,
इक ही उम्मीद बची थी
तुम्हें देख पाने की।

कल दिनभर ताका किया
तुम्हारे घर की जानिब,
उन पहाड़ियों पर से मैं।
पूरा शहर नज़र आया तुम्हारा
वहाँ से,
आया नहीं नज़र
तुम्हारा घर,
कमरे की खिड़की और
ना ही खिड़की में खड़े तुम
लेकिन।

तुम्हारे कमरे की खिड़की से तो
साफ़ नज़र आती थी ये पहाड़ी!

मेरे ज़ेहन की खिड़की
और तुम्हारे
ख़यालों की पहाड़ियों के दरमियाँ,
कुछ ऐसा ही फ़ासला
हो गया है अब।

- अर्पण क्रिस्टी

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