धीरे-धीरे सही मगर जलने लगा है कोई?

धीरे-धीरे सही मगर जलने लगा है कोई?
एक अरमां की तरह मचलने लगा है कोई?

न जाने क्या सबब रहा लेकिन ये दर्दे-दिल,
क़तरा बनके अश्कों में ढलने लगा है कोई?

खता उनकी थी जो दे धोखा बिना समझे,
मगर अब गिर के संभलने लगा है कोई?

तुम अकेली नहीं औरअब्बल जहान में,
पहले भी थे कुछ और कहने लगा है कोई?

जब दिल से नफरत का ज़हर मर जायेगा,
लगेगा इसमें जैसे अब रहने लगा है कोई?

ज़ख्म खा-खाके यूं बेहिस हुआ सीना मेरा,
अब मेरी आँख से लहू बहने लगा है कोई?

बेशक हैं मुब्तिला खुद अपनी खुदी में हम,
घर जिगर में मगर यूं करने लगा है कोई?

देखा यहां जलबा-ए-मस्तानगी-ए-'अली',
अहसासे-मर्ग से अगर डरने लगा है कोई?
❤ ❤ ❤

Favorite Posts