अब आग के लिबास को ज़्यादा न दाबिए - कुँवर बेचैन

अब आग के लिबास को ज़्यादा न दाबिए,
सुलगी हुई कपास को ज़्यादा न दाबिए ।

ऐसा न हो कि उँगलियाँ घायल पड़ी मिलें,
चटके हुए गिलास को ज़्यादा न दाबिए ।

चुभकर कहीं बना ही न दे घाव पाँव में,
पैरों तले की घास को ज़्यादा न दाबिए ।

मुमकिन है ख़ून आपके दामन पे जा लगे,
ज़ख़्मों के आसपास को ज़्यादा न दाबिए ।

पीने लगे न ख़ून भी आँसू के साथ-साथ,
यों आदमी की प्यास को ज़्यादा न दाबिए ।

💡कुँवर बेचैन

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