--ग़ज़ल-- ~मतला

हर पल रहे ख़्याल में, उनको भुला सकते नहीं!
है बड़ी मासूम चाहत, हम रुला  सकते नहीं!!
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ज़ाया ना कर ये वक़्त तूँ रहबर की आस में!
जाने वाले को सदा दे कर बुला सकते नहीं!!
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एक था राहे सफ़र मंज़िल जुदा जुदा अपनी!
जो लिखा तक़दीर में उसको मिटा सकते नहीं!!
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प्यार दे कर भी मिले चाहत ज़रूरी तो नहीं!
हम वफ़ा करते रहे उनको मना सकते नहीं!!
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इस दिल-ए-मासूम पर है अक़्स उनका ही सदा!
प्यार के इस रंग पर दूजा चढ़ा सकते नहीं!!
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हर दफ़ा हमको ही ख़तावार वो कहते रहे!
बेबसी चाहत की हम उनको बता सकते नहीं!!
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आपसे नज़रें मिली हमने खुदाई देख ली!
इससे ज़्यादा आपसे रिश्ता निभा सकते नहीं!!
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गिरह का शेर--

आ भी जा निकलने को है ख़्वाहिशों का जनाज़ा!
जाने वाले को सदा दे कर बुला सकते नहीं!!
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