ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं , और क्या जुर्म है पता ही नहीं ।

ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं ,
और क्या जुर्म है पता ही नहीं ।

इतने हिसों  में बँट गया हूँ मैं,
मेरे हिसे में कुछ बचा ही नहीं।

जिंदगी मौत तेरी मंज़िल है,
दूसरा कोई रास्ता ही नहीं।

जिस के कारण फ़साद होते हैं,
उस का कोई अता पता ही नहीं।

ज़िंदगी अब बता कहाँ जाऐं ,
ज़हर बाज़ार में मिला ही नहीं ।

सच घटे  या बढ़े तो सच न रहे,
झूठ की कोई इनतहा ही नहीं ।

धन के हाथों बिके हैं सब क़ानून,
अब किसी जुर्म की सज़ा ही नहीं ।

चाहे सोने के फ़्रेम में जडदो,
आइना झूठ बोलता ही नहीं।

अपनी रचनाओं में अभी ज़िंदा हूँ
दुर संसार से गया ही नहीं।

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