ज़िन्दगी की सीढ़ियों पे इक ऐसा मुकाम भी है,

ज़िन्दगी की सीढ़ियों पे इक ऐसा मुकाम भी है,
अभी चढ़ते रहो बस, आगे फिर ढलान भी है...!!

यूँ तो उसे बड़ी शिकायतें हैं मेरे साथ रहने में,
पर अंदर से उसे मेरे होने का गुमान भी है...!!

तुम्हें लगता है वो सारी उम्र तुम्हारे सितम सहेगा,
वो "हम" नहीं हैं, उसके मुंह में ज़बान भी है...!!

आज उस सफ़र को पूरा कर के लौटे हैं हम,
जिसमें थक कर हारी खुद थकान भी है...!!

सारी उमर लगा दी उसने "कागज़"जमा करने में,
अब "अपनों" में आईना, दरख्त और मकान भी है...!!

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