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kisi ke khatir

kisi ke khatir mohabat ki intha kar do
itna bhi nhi ki usko khuda kar do
mat chaho kisi ko toot kar etna
apni hi wafawo se use bewafa kar do

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

बैठ जाता हूं मिट्टी पे अक्सर..

हमारे सहायक

एक अतिश्रेष्ठ व्यक्ति थे, एक दिन उनके पास एक निर्धन आदमी आया और बोला की:- "मुझे अपना खेत कुछ साल के लिये उधार दे दीजिये, मैं उसमे खेती करूँगा और खेती करके कमाई करूँगा।"
वह अतिश्रेष्ठ व्यक्ति बहुत दयालु थे, उन्होंने उस निर्धन व्यक्ति को अपना खेत दे दिया और साथ में पांच सहायक किसान भी सहायता के रूप में खेती करने को दिये और कहा की:- "इन पांच सहायक किसानों को साथ में लेकर खेती करो, खेती करने में आसानी होगी, इस से तुम और अच्छी फसल की खेती करके कमाई कर पाओगे।"
वो निर्धन आदमी ये देख के बहुत खुश हुआ की उसको "उधार में खेत भी मिल गया और साथ में पांच सहायक किसान भी मिल गये।"
लेकिन वो आदमी अपनी इस ख़ुशी में बहुत खो गया, और वह पांच सहायक किसान अपनी मर्ज़ी से खेती करने लगे और वह निर्धन आदमी रात-दिन अपनी ख़ुशी में ही डूबा रहा।
और जब फसल काटने का समय आया तो देखा की फसल बहुत ही ख़राब हुई थी।
उन पांच सहायक किसानों ने खेत का उपयोग अच्छे से नहीं किया था, न ही अच्छे बीज डाले, जिससे फसल अच्छी हो सके।
जब उस अतिश्रेष्ठ दयालु व्यक्ति ने अपना खेत वापस माँगा तो वह निर्धन व्यक्ति रोता ह…

हरिवंशराय बच्चन जी की एक खूबसूरत कविता

हरिवंशराय बच्चन जी की एक खूबसूरत कविता,, _"रब" ने. नवाजा हमें. जिंदगी. देकर;_
_और. हम. "शौहरत" मांगते रह गये;_
_जिंदगी गुजार दी शौहरत. के पीछे;_
_फिर जीने की "मौहलत" मांगते रह गये।_ _ये कफन , ये. जनाज़े, ये "कब्र" सिर्फ. बातें हैं. मेरे दोस्त,,,_
_वरना मर तो इंसान तभी जाता है जब याद करने वाला कोई ना. हो...!!_ _ये समंदर भी. तेरी तरह. खुदगर्ज़ निकला,_
_ज़िंदा. थे. तो. तैरने. न. दिया. और मर. गए तो डूबने. न. दिया . ._ _क्या. बात करे इस दुनिया. की_
_"हर. शख्स. के अपने. अफसाने. हे"_ _जो सामने. हे. उसे लोग. बुरा कहते. हे,_
_जिसको. देखा. नहीं उसे सब "खुदा". कहते. है. 👏👏👏👏👏👏

हो गई है पीर पर्वत-सी

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।
- दुष्यन्त कुमार

रोशनी चाही थी, आग लगा दी किसने

रोशनी चाही थी, आग लगा दी किसने
मेरी नेकियों की, मुझे सज़ा दी किसने राख के ढ़ेर में अमन पसरा था
बुझें अंगारों को फिर हवा दी किसने चांद खामोश था, तारें झपकियां लेते हुए
खामोश रात में बिरहन की पीर जगा दी किसने बुरा किया है किसी का, ना बुरा चाहा है
ना-करदा गुनाहों की सज़ा दी किसने साफ-आसमां है, घर सैलाब में डूबा है
अश्कों की झड़ी लगा दी किसने खामोश मुहब्बत, खामेशी से मिलते हैं
शहर भर में मुहब्बत की बात उड़ा दी किसने..

दिल के टुकड़े मजबूर करते है कलम चलाने को वरना

^दिल के टुकड़े मजबूर करते है कलम चलाने को वरना...हक़ीक़त में कोई भी खुद का दर्द लिखकर खुश नही होता..

^मैं तो बस एक मामूली सा सवाल हूँ “साहिब..!और लोग कहते हैं.. तेरा... कोई जवाब नहीं....!!!!
^दर्द हल्का है,
साँस भारी है,जिए जाने की
रस्म जारी है...
^शौंक नहीं है मुझे अपने जज़्बातों को यूँ सरेआम लिखने का …मगर क्या करूँ ,
अब जरिया ही ये है तुझसे बात करने का..........


^एक मुट्ठी इश्क़ बिखेर दो  इस ज़मीन पे,बारिश का मौसम है शायद मोहब्बत पनप जाए।

अभी मोहब्बत नई-नई है!

ख़मोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई-नई है, अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई-नई है! 
अभी न आएगी नींद तुमको, अभी न हमको सुकूँ मिलेगा, अभी तो धड़केगा दिल ज़्यादा, अभी मुहब्बत नई नई है!
बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ, फ़ज़ा में खुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है! 
जो खानदानी रईस हैं वो मिजाज़ रखते हैं नर्म अपना, तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई-नई है!
ज़रा सा कुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में, अभी से उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है!
बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे है,ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिसकी ताक़त नई नई है!

मै रौशनी की तलाश मे कुछ.....

मै रौशनी की तलाश मे कुछ, बुझी मशालें जला रहा हूँ,
स॔भल के रहना अंधेरे वालों, मै अपना सूरज बना रहा हूँ,खरीददारों ये मत समझना, मयार मे मेरे कुछ कमी है,
तुम्हारी गुरबत को देख कर मै खुद अपनी कीमत घटा रहा हूँसुना है मैने कि आज कल वो, खुदा समझने लगे हैं खुद को,
अब उनके सजदे मे सर को अपने, मै झुक के रहना सिखा रहा हूँ,मेरी मुहब्बत या तेरी नफ़रत ये बाज़ी जीतेगा कौन देखें,
तू मूझ को खुद मे घटा रही है, मै तुझको खुद मे बढा रहा हूँ,अगर हवाओं को कोई शक है, तो हौसले मेरे आज़मा लें,
मै कितनी शिद्दत से आसमाँ मे कटी पतंगें उड़ा रहा हूँशिकस्तगी का जो दर्द था वो छुपा के सीने मे रख लिया है,
मै खुद तो हारा हुआ हूँ लेकिन जहाँ को हिम्मत बंधा रहा हूँ,तुझे भुलाया है जब से मैने अजब पसोपेश मे पड़ा हूँ
मै तुझ से दूरी बढा रहा हूँ या तेरे नज़दीक आ रहा हूँ!

चोट पे चोट देते ही जाने का शुक्रिया ~कुँवर बेचैन

चोटों पे चोट देते ही जाने का शुक्रिया
पत्थर को बुत की शक्ल में लाने का शुक्रियाजागा रहा तो मैंने नएकामकरलिए
नींदआज तेरे न आने का शुक्रियासूखा पुराना ज़ख्मनए को जगह मिली
स्वागतनए का और पुराने का शुक्रियाआतीं न तुम तो क्यों मैं बनाता ये सीढ़ियाँ
दीवारों, मेरी राह में आने का शुक्रियाआँसू-सा माँ की गोद में आकरसिमट गया
नज़रों से अपनी मुझको गिराने का शुक्रियाअबयहहुआ कि दुनिया ही लगती है मुझको घर
यूँ मेरे घर में आग लगाने का शुक्रियाग़म मिलते हैं तो और निखरती है शायरी
यहबात है तो सारे ज़माने का शुक्रियाअब मुझको आ गए हैं मनाने के सबहुनर
यूँ मुझसे `कुँअर' रूठ के जाने का शुक्रिया...

एक शिक्षाप्रद लघु दृष्टांत।

किसी राजा के पास एक बकरा था। एक बार उसने एलान किया की जो कोई इस बकरे को जंगल में चराकर तृप्त करेगा मैं उसे आधा राज्य दे दूंगा।किंतु बकरे का पेट पूरा भरा है या नहीं इसकी परीक्षा मैं खुद करूँगा।इस एलान को सुनकर एक मनुष्य राजा के पास
आकर कहने लगा कि बकरा चराना कोई बड़ी बात नहीं है।वह बकरे को लेकर जंगल में गया और सारे दिन उसे घास चराता रहा,, शाम तक उसने बकरे को खूब घास खिलाई और फिर सोचा की सारे दिन इसने इतनी घास खाई है। अब तो इसका पेट भर गया होगा तो अब इसको राजा के पास ले चलूँ,,बकरे के साथ वह राजा के पास गया,, राजा ने थोड़ी सी हरी घास बकरे के सामने रखी तो बकरा उसे खाने लगा।इस पर राजा ने उस मनुष्य से कहा की तूने उसे पेट भर खिलाया ही नहीं वर्ना वह घास क्यों खाने लगता।बहुत जनो ने बकरे का पेट भरने का प्रयत्न किया किंतु ज्यों ही दरबार में उसके सामने घास डाली जाती तो वह फिर से खाने लगता।एक विद्वान् ब्राह्मण ने सोचा इस एलान का कोई तो रहस्य है, तत्व है,,मैं युक्ति से काम लूँगा,, वह बकरे को चराने के लिए ले गया। जब भी बकरा घास खाने के लिए जाता तो वह उसे लकड़ी से मारता,, सारे दिन में ऐसा कई बार हुआ,, …