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August, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ज्ञान का महत्व

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एक सेठ के पास बड़ी मिल थी। उससे बहुत सारे लोगों की जीविका चलती थी। लाखों का उत्पादन होता था और सेठजी करोड़ों में खेलते थे।अपने कर्मचारियों का भी वे समुचित ध्यान रखते थे। आखिल मिल तो कर्मचारियों के बल पर चलती है। इस तथ्य को वे हमेशा याद रखते थे। कर्मचारी भी उनके स्नेह के मद्देनजर उनके प्रति निष्ठावान थे। एक दिन अचानक सेठजी की मिल में समस्त कार्य रुक गए क्योंकि किसी महत्वपूर्ण मशीन में खराबी आ गई थी। मिल में कार्यरत कर्मचारियों से लेकर विशेषज्ञ तक अपना दिमाग लगा-लगाकर हार गये किंतु, मशीन चालू न हो पाई। सेठजी भी बड़े हैरान-परेशान हो गए। उन्होंने अपने कारिंदों को इधर-उधर दौड़ाया कि कहीं से किसी मशीन सुधारक को लेकर आओ।थोड़ी देर बाद वे लोग एक सामान्य से व्यक्ति को लेकर आए। सेठजी ने उसे देखते हुए सशंकित भाव से पूछा- ‘‘भाई, तुम इस मशीन को चालू कर पाओगे ?’’उस आदमी ने मशीन को ध्यान से देखा और कहा- ‘‘मैं मशीन ठीक कर दूंगा, किंतु इस कार्य के पंद्रह हजार रुपए लूंगा।’’सेठ जी बड़ी दुविधा में पड़े कि इतने छोटे-से काम के इतने रुपए दें या नहीं। किंतु मशीन के न चलने पर उत्पादन बंद होगा और …

एक सूफी कहानी

एक चोर रात के समय किसी मकान की खिड़की में से भीतर जाने लगा कि खिडकी की चौखट टूट जाने से गिर पड़ा और उसकी टांग टूट गई। अगले दिन उसने अदालत में जाकर अपनी टांग टुटने का दोष मकान मालिक पर लगाया। मकान मालिक को बुलाकर पूछा गया तो उसने अपनी सफाई में कहा - इसका जिम्मेदार वह बढ़ाई है, जिसने कि खिडकी बनाई। बढ़ाई को बुलाया गया, तो उसने कहा कि मकान बनाने वाले ठेकेदार ने दिवार का खिडकी वाला हिस्सा मजबूती से नही बनाया था।
ठेकेदार ने अपनी सफाई में कहा-    मुझसे यह गलती एक औरत की वजह से हुई जो वहां से गुजर रही थीं। उसने मेरा ध्यान अपनी तरफ खिंच लिया था। जब उस औरत को अदालत में पेश किया गया तो उसने कहा- उस समय मैंने बहुत बढिया लिबास पहन रखा था। आम तौर पर मेरी तरफ किसी की नजर उठती नहीं है, सो कसूर उस लिबास का है जो इतना बढिया सिला हूआ था।
न्यायधीश ने कहा- तब तो उस सिने वाले दर्जी को बुलाया जाय, वहीं मुलजिम है। उसे अदालत में हाजिर किया जाय। वह दर्जी उस स्त्री का पति निकला और वह चोर भी था, जिसकी टांग टूटी थी। यह जगत का सर्वाधिक आश्चर्य जनक नियम है जो गड्डे तुम दुसरो के लिये खोदते हो उसमे स्वयं गिरना पडता …

एक शिक्षाप्रद लघु दृष्टांत।

किसी राजा के पास एक बकरा था। एक बार उसने एलान किया की जो कोई इस बकरे को जंगल में चराकर तृप्त करेगा मैं उसे आधा राज्य दे दूंगा।किंतु बकरे का पेट पूरा भरा है या नहीं इसकी परीक्षा मैं खुद करूँगा।इस एलान को सुनकर एक मनुष्य राजा के पास
आकर कहने लगा कि बकरा चराना कोई बड़ी बात नहीं है।वह बकरे को लेकर जंगल में गया और सारे दिन उसे घास चराता रहा,, शाम तक उसने बकरे को खूब घास खिलाई और फिर सोचा की सारे दिन इसने इतनी घास खाई है। अब तो इसका पेट भर गया होगा तो अब इसको राजा के पास ले चलूँ,,बकरे के साथ वह राजा के पास गया,, राजा ने थोड़ी सी हरी घास बकरे के सामने रखी तो बकरा उसे खाने लगा।इस पर राजा ने उस मनुष्य से कहा की तूने उसे पेट भर खिलाया ही नहीं वर्ना वह घास क्यों खाने लगता।बहुत जनो ने बकरे का पेट भरने का प्रयत्न किया किंतु ज्यों ही दरबार में उसके सामने घास डाली जाती तो वह फिर से खाने लगता।एक विद्वान् ब्राह्मण ने सोचा इस एलान का कोई तो रहस्य है, तत्व है,,मैं युक्ति से काम लूँगा,, वह बकरे को चराने के लिए ले गया। जब भी बकरा घास खाने के लिए जाता तो वह उसे लकड़ी से मारता,, सारे दिन में ऐसा कई बार हुआ,, …

🌷🌸🌷 स्त्री का गुण 🌷🌸🌷

एक बार सत्यभामा ने श्रीकृष्ण से पूछा मैं आप को कैसी लगती हूँ ? श्रीकृष्ण ने कहा तुम मुझे नमक जैसी लगती हो।सत्यभामा इस तुलना को सुन कर क्रुद्ध हो गयी, तुलना भी की तो किस से, आपको इस संपूर्ण विश्व में मेरी तुलना करने के लिए और कोई पदार्थ नहीं मिला।श्रीकृष्ण ने उस वक़्त तो किसी तरह सत्यभामा को मना लिया और उनका गुस्सा शांत कर दिया।कुछ दिन पश्चात श्रीकृष्ण ने अपने महल में एक भोज का आयोजन किया। छप्पन भोग की व्यवस्था हुई।सर्वप्रथम आठों पटरानियों को, जिनमें पाकशास्त्र में निपुण सत्यभामा भी थी, से भोजन प्रारम्भ करने का आग्रह किया श्रीकृष्ण ने।सत्यभामा ने पहला कौर मुँह में डाला मगर यह क्या.. सब्जी में नमक ही नहीं था।सत्यभामा ने उस कौर को मुँह से निकाल दिया। फिर दूसरा कौर मावा-मिश्री का मुँह में डाला और फिर उसे चबाते-चबाते बुरा सा मुँह बनाया और फिर पानी की सहायता से किसी तरह मुँह से उतारा।अब तीसरा कौर फिर कचौरी का मुँह में डाला और फिर.. आक्..थू !तब तक सत्यभामा का पारा सातवें आसमान पर पहुँच चुका था। जोर से चीखीं.. किसने बनाई है यह रसोइ ?सत्यभामा की आवाज सुन कर श्रीकृष्ण दौड़ते हुए सत्यभामा के पास…

परमात्मा की परख

एक समय की बात है किसी गाँव में एक साधु रहता था, वह परमात्मा का बहुत बड़ा भक्त था और निरंतर एक पेड़ के नीचे बैठ कर तपस्या किया करता था | उसका परमात्मा पर अटूट विश्वास था और गाँव वाले भी उसकी इज्ज़त करते थे| एक बार गाँव में बहुत भीषण बाढ़ आ गई | चारो तरफ पानी ही पानी दिखाई देने लगा, सभी लोग अपनी जान बचाने के लिए ऊँचे स्थानों की तरफ बढ़ने लगे,जब लोगों ने देखा कि साधु महाराज अभी भी पेड़ के नीचे बैठे परमात्मा का नाम जप रहे हैं तो एक ग्रामीण ने उन्हें यह जगह छोड़ने की सलाह दी, पर साधु ने कहा- ” तुम लोग अपनी जान बचाओ मुझे तो मेरा परमात्मा बचाएगा!” धीरे-धीरे पानी का स्तर बढ़ता गया , और पानी साधु के कमर तक आ पहुंचा , इतने में वहां से एक नाव गुजरी,मल्लाह ने कहा- ” हे साधू महाराज आप इस नाव पर सवार हो जाइए मैं आपको सुरक्षित स्थान तक पहुंचा दूंगा  “साधू ने कहा - नहीं, मुझे तुम्हारी मदद की आवश्यकता नहीं है , मुझे तो मेरा परमात्मा बचाएगा !!नाव वाला चुप-चाप वहां से चला गया. कुछ देर बाद बाढ़ और प्रचंड हो गयी , फिर साधु ने पेड़ पर चढ़ना उचित समझा और वहां बैठ कर परमात्मा को याद करने लगा, तभी अचानक उन्हे…

ऐसा मित्र कहाँ से लाऊ

*कहाँ कहाँ खोजूँ मैं उसको*
           *किसके दरवाज़े पर जाऊँ*
*जो मेरे चावल खा जाए*
           *ऐसा मित्र कहाँ से लाऊँ।*जीवन की इस कठिन डगर में
            दोस्त हज़ारों मिल जाते हैं
जो मतलब पूरा होने पर
            अपनी राह बदल जाते हैं
हरदम साथ निभाने वाला
            साथी ढूँढ कहाँ से लाऊँ *जो मेरे चावल खा जाए*
           *ऐसा मित्र कहाँ से लाऊँ।*हार सुनिश्चित मालूम थी पर
            साथ न छोड़ा दुर्योधन का
मौत सामने आई फिर भी
            पैर न पीछे हटा कर्ण का
मित्रों पर जो जान लुटाएँ
            कहाँ खोजने उनको जाऊँ *जो मेरे चावल खा जाए*
         *ऐसा मित्र कहाँ से लाऊँ।*दर्द बयाँ करने पर आए
          वे तो साथी कहलाते हैं
मन की बात समझ जाए जो
          वे ही मित्र कहे जाते हैं
जिनसे मन के तार जुड़ें वो
          किस कोने से ढूँढ के लाऊँ *जो मेरे चावल खा जाए*
         *ऐसा मित्र कहाँ से लाऊँ।*कविता सुनकर बीवी बोली
          क्यों नाहक चिन्ता करते हो
जो घर में ही हाज़िर है, तुम
           उसको बाहर क्यों तकते हो
मैं ही तो हूँ कर्ण तुम्हारी
           और कृष्ण भी मैं ही तो हूँ
अंधकार में साथ न छोड़े
         …

कहाँ आ के रुकने थे रास्ते

कहाँ आ के रुकने थे रास्ते
कहाँ मोड़ था उसे भूल जा
वो जो मिल गया उसे याद रख
जो नहीं मिला उसे भूल जा
कहाँ आ के रुकने थे रास्ते
कहाँ मोड़ था उसे भूल जा
वो तेरे नसीब की बारिशें
किसी और छत पे बरस गयीं
दिल-इ-बेखबर मेरी बात सुन
उसे भूल जा , उसे भूल जा
कहाँ आ के रुकने थे रास्ते
कहाँ मोड़ था उसे भूल जा
मैं तो घुम था तेरे ही ध्यान में
तेरी आस तेरे घुमान में
सबा कह गई मेरे काण में
मेरे साथ आ उसे भूल जा
कहाँ आ के रुकने थे रास्ते
कहाँ मोड़ था उसे भूल जा
किसी आँख में नबी अश्क़-इ-ग़म
तेरे बाद कुछ भी नहीं है कम
तुझे ज़िन्दगी ने भुला दिया
तू भी मुस्कुरा उसे भूल जा
कहाँ आ के रुकने थे रास्ते
कहाँ मोड़ था उसे भूल जा
ना वो आँख ही तेरी आँख थी
ना वो खुवाब ही तेरा खुवाब था
दिल-इ-मुन्तज़िर तो या किस लिए
तेरा जागना उसे भूल जा
कहाँ आ के रुकने थे रास्ते
कहाँ मोड़ था उसे भूल जा
कहाँ आ के रुकने थे रास्ते
कहाँ मोड़ था उसे भूल जा
वो जो मिल गया उसे याद रख
जो नहीं मिला उसे भूल जा
कहाँ आ के रुकने थे रास्ते
कहाँ मोड़ था उसे भूल जा

सिलसिला दर्द का थम गया होता

सिलसिला दर्द का थम गया होता,
तू  अगर  मेरा  ही  बन  गया होता,
मुश्किलें मुझको तब  तोड़तीं कैसे,
सामने उनके  तो मैं तन गया होता!टूटा हूँ इतना अब तो मैं बिखरता हूँ,
हर मोड़ पर अब तो मैं फिसलता हूँ,
कोई देख  ले न  मेरे हालात नाज़ुक,
सबसे छुपकर ही तो मैं निकलता हूँ!तू  नहीं है  मगर तेरा  अहसास तो है,
जल तो  पास नहीं मगर प्यास तो है,
बिन तेरे जीना भी अब कोई जीना है,
शरीर है सुप्त मगर  अभी साँस तो है!ख़ुद अपने ग़म को गले लगा लेता हूँ,
दिल के ज़ख़्मों को अब जगा देता हूँ,
बढ़ जाती  है जब हद से  बेबसी मेरी,
दर्द अपने मैं काग़ज़ पर उतार देता हूँ!इक बार फिर मुझे छोड़ने को आजा,
फिर मुझको ही तो तोड़ने को आजा,
थोड़ा जीवन फिर से सँवार कर मेरा,
फिर से मुझसे मुख मोड़ने को आजा!

कोई ढलते हुए सूरज का किनारा लिख दो,

कोई ढलते हुएसूरज का किनारा लिख दो,
मुझको शबनम से जला एक शरारा लिख दो,जिस कहानी में मुकम्मल नहीं किरदार मेरा,
उसके किस्सों में अधूरा सा दुबारा लिख दो,किश्तें बाँधी हैं हक़ीक़त ने मेरे लम्हों की,
हक़ तसव्वुर के ख़ज़ाने पे तुम्हारा लिख दो,दूरियाँ हिज़्र की या वस्ल रूहानी अपना,
दिल को जज़्बात की गरमाई का पारा लिख दो,जिसको खुद रब ने नवाज़ा है अपनी रहमत से,
उसी इक ताज के दर सदक़ा हमारा लिख दो,आरजू, चाहतें, एहसास या अरमाँ दिल के,
जीत लीं हर शय, बस तुमसे ही हारा लिख दो।

जिसके पास जो है, वही वह दूसरे को दे सकता है..!

*एक व्यक्ति ने एक नया मकान खरीदा ! उसमे फलों का बगीचा भी था। पडौस का मकान पुराना था और उसमे कई लोग रहते थे।**कुछ दिन बाद उसने देखा, कि पडौस के मकान से किसी ने बाल्टी भर कूडा, उसके घर के दरवाजे पर डाल दिया है।**शाम को उस व्यक्ति ने एक बाल्टी ली, उसमे ताजे फल रखे और उस घर के दरवाजे की घंटी बजायी।**उस घर के लोग बेचैन हो गये और वो सोचने लगे, कि वह उनसे सुबह की घटना के लिये लडने आया है..!**अतः वे पहले ही तैयार हो गये और बुरा भला बोलने लगे।**मगर जैसे ही उन्होने दरवाजा खोला, वे हैरान हो गये। रसीले ताजे फलों की भरी बाल्टी के साथ,*
*मुस्कान चेहरे पर लिये नया पडोसी, सामने खडा था...! सब हैरान थे।*
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.*उसने कहा -- जो मेरे पास था, वही मैं आपके लिये ला सका...!**सच है जिसके पास जो है, वही वह दूसरे को दे सकता है..!**जरा सोचिये, कि आपके पास दूसरो के लिये क्या है..?**दाग तेरे दामन के धुले ना धुले,*
*नेकी तेरी कही तुला पर तुले ना तुले।*
*मांग ले अपनी गलतियो की माफी खुद से,*
*क्या पता आँख कल ये खुले ना खुले ?**प्यार बांटो प्यार मिलेगा,*
*खुशी बांटो खुशी मिलेगी.......*✍😊
🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼

इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए

इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए
दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिएकी भूले हैं रफ्ता रफ्ता उन्हें मुदत्तों  में हम
किस्तों में ख़ुदकुशी का मज़ा हम से पूछिएआगाज़-ए -आशिक़ी का मज़ा आप जानिये
अंज़ाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिएजलते दीयों में जलते घरों जैसी जौ  कहाँ
सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिएवो जान ही गए की हमें उनसे प्यार है
आँखों की मुखबिरी का मज़ा हम से पूछिएकी हसने का शौक़ हमको ही था आप की तरह
हंसिये मगर हसी का मज़ा हम से पूछिएहम तौबा कर के मर गए बेमौत-ए-‘खुमार’
तौहीन-ए-मैकशी का मज़ा हम से पूछिए

कानपुर का खतरनाक शायर

🤣🤣कानपुर का खतरनाकशायर🤣🤣
तुम्हारे हुस्न के मोतीझील में फंसकर
तेरे इश्क में परेड किये जाता है😜
दिल धड़कता था कभी घंटाघर सा
अब यादों का भैरवघाट बना जाता है😜
तुम लगती हो जैसे गिलौरी चौरसिया की
यहाँ ठग्गू के लड्डू सा मुंहहुआ जाता है🤣
तेरी सूरत के इस्काँनमंदिर को देखकर
मेरा मन भी ब्लूवर्ड सा मचल जाता है🤣
चहकती हो तुममालरोड की शाम सी
मेरा प्यार यहाँ कबाड़ी मार्कट सा हुआ जाता हैं😝
तेरी पतली कमर है जैसे गलियाँ चमनगंज की
उसपर मेरा दिल अफीमकोठी के जाम सा रुक जाता है😂
बदन है खूबसूरत तुम्हारा फूलबाग सा
और ये आशिकधूल में नौबस्ता की नहाये जाता है।😂😂😂😂

Love a person, Relationship

*"If you love a person and live the whole life with him or with her, a great intimacy will grow and love will have deeper and deeper revelations to make to you.  It is not possible if you go on changing partners very often.  It is as if you go on changing a tree from one place to another, then another; then it never grows roots anywhere.  To grow roots, a tree needs to remain in one place.  Then it goes deeper; then it becomes stronger.  Intimacy is good, and to remain in one commitment is beautiful, but the basic necessity is love.  If a tree is rooted in a place where there are only rocks and they are killing the tree, then it is better to remove it.  Then don’t insist that it should remain in the one place.  Remain true to life – remove the tree, because now it is going against life.”**_OSHO_*_Good morning dear friends !_🌹🌹🙏🏻🌹🌹

वो छोड़ गया मुझे तनहा यादों में

वो छोड़ गया मुझे तनहा यादों में
जिसको हर दम माँगा फरियादों में
जो वादे सारे तोड़ गया
खंजर सा दिल में छोड़ गई
नफ़रत तुझसे भी ख़ूब हुई
और सच नफ़रत तुझसे यूँ करती हूँ
जिस राह में तेरा ज़िक्र हुआ
वो राह बदल मैं देती हूँ
फिर कान जो थोड़े खड़े हुए
सुन कर दुनिया की बातें
मैं कुछ - कुछ, कुछ - कुछ सहती हूँ
फिर दिल को संभाले कोने में
ख़ुद से ही यह कहती हूँ
कि जिस राह में तेरा ज़िक्र हुआ
वो राह बदल मैं देती हूँ