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Alfred Nobel


मैं अक्सर हिंदी सोच के लिए कुछनकुछरिसर्च करते रहता हूँ. ताकि readers को motivational stories पढने के लिए deliver करता रहूँ.
आज की story पढने के बाद, ये तुरंत ही मेरी one of the favorites बन गयी.
ये एक सत्य घटना है.
करीब सौ साल पहले एक समृद्ध आदमी ने जब सुबह का newspaper उठाया तो वो दंग रह गया.
उसमे उसकी मृत्यु की खबर छपी हुईथी.
पहले तो उसे यकीन नहीं हुआ, वो थोडा हडबडा सा गया.
पर जब उसे एहसास हुआ की, अखबार वालो ने ग़लतफहमी के कारण किसी और की जगह उसकी मृत्यु की ख़बर छाप दी है तो उसे पहले थोडा गुस्सा आया. आखिर ऐसा भी भला कोई करता है?फिर उसे थोड़ी हँसी आई, उन लोगों की मूर्खता पर जो इसे सच मान बैठे होंगे.
पर फिर उसने स्तिथि पर गहनविचार किया. उसने सोचा की, “जरा देखा तो जाए, की मेरे मरने पर क्या क्या छपा है.”
वो बड़ा दुखी हुआ, जब पढ़ा की पूरे अख़बार में उसे ‘मौत का सौदागर’ और dynamite king’ से संबोधित किया गया है.
दरअसल, इस व्यक्ति ने ‘dynamite’ का अविष्कार किया था.
उन्होंने सोचा की क्या लोग मुझे मेरे मरने के बाद इस तरह याद करेंगे? की मैं मौत का सौदागर था?
“नहीं ऐसा नहीं हो सकता”, उसने सोचा.
इस घटना के बाद उसने अपने जीवन को कुछ इस तरह बदल दिया की लोग उन्हें आज ‘मौत का सौदागर’ नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे विश्वसनीय सम्मान ‘Nobel Prize’ की वजहसे जानते है.
इनव्यक्ति का नाम Sir Alfred Nobel था, जिनकी याद में Nobel Prize दिया जाता है.
तो देखिये दोस्तों, उन्हें तो जीते जी इस बात का पता पड़ गया की लोग उनकी मौत पर क्या प्रतिक्रिया देंगे.
और अखबार की एक गलती से उन्हें अपनी गलती का आभास हुआ.
आज हम सभी उन्हें आदर से याद करते है.
हमे शायद दूसरा मौका न मिले,इसलिए चलिए यही कोशिश करते है,
की जब भी हम जाए.
तो लोग हमे याद करे की, “यार वो बंदा बहुत अच्छा था.”

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हो गई है पीर पर्वत-सी

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
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रोशनी चाही थी, आग लगा दी किसने

रोशनी चाही थी, आग लगा दी किसने
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ना-करदा गुनाहों की सज़ा दी किसने साफ-आसमां है, घर सैलाब में डूबा है
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अभी न आएगी नींद तुमको, अभी न हमको सुकूँ मिलेगा, अभी तो धड़केगा दिल ज़्यादा, अभी मुहब्बत नई नई है!
बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ, फ़ज़ा में खुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है! 
जो खानदानी रईस हैं वो मिजाज़ रखते हैं नर्म अपना, तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई-नई है!
ज़रा सा कुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में, अभी से उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है!
बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे है,ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिसकी ताक़त नई नई है!

कवि डाकू

एक कवि गरीबी से तंग आकर डाकू बन
गया और एक बैंक लूटने जा पहुंचा.
बन्दूक लहराते हुए बोला -
“अर्ज किया है …
तकदीर में जो है वही मिलेगा …
हैंड्स अप ! … कोई अपनी जगह से
नहीं हिलेगा … !”
फिर कैशियर से बोला -
“कुछ ख्वाब मेरी आँखों में से निकाल
दो …
जो कुछ भी है जल्दी से इस बैग में डाल
दो … ”
माल समेटने के बाद पब्लिक से बोला -
“बहुत कोशिश करता हूँ तेरी याद
भुलाने की …
ख़बरदार जो किसी ने कोशिश
की पुलिस बुलाने की … ”
जाते-जाते बैंक के गार्ड से बोला -
“भुला देना मुझको क्या जाता है
तेरा …
मैं गोली मार
दूंगा जो पीछा किया मेरा … !!!