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संदेश

है बोझ ज़िंदगी सिर से उतर जाने दो

😎😋😜❛है बोझ ज़िंदगी सिर से उतर जाने दो बेवजह जी रहे हैं आज तो मरजाने दो।
बांध कर मैंने उम्मीदों क कारवां रखा यहां कोई नहीं अपना ये गुज़र जाने दो ।
सूखी आंखो का रोना नज़र नहीँ आतामेंरी आंखों में ये शैलाब उतर आने दो।
मैनें खुदको समेंट रखा है तेरी यादों मेंयादों के आईनें में हमको संवर जाने दो।
हम संभल जाएंगे हालात सम्हलने तो देआज दामन से ख़ुशियों को मुक़र जाने दो।
मुझे न राह दिखाओ यूं  मंज़िल की मेरी जहां ले जाए ये ज़िंदगी उधर जाने दो ।
एक दिन दिल की दबी आह सुनाई देगीदर्द से दिल हमारा और भी भर जाने दो ।
हम रहे या न रहे जानिब सदाएं गूजेँगीसुनो आइना सी टूटी हूं बिखर जाने दो ।❜
हाल की पोस्ट

दिल के टुकड़े मजबूर करते है कलम चलाने को वरना

^दिल के टुकड़े मजबूर करते है कलम चलाने को वरना...हक़ीक़त में कोई भी खुद का दर्द लिखकर खुश नही होता..

^मैं तो बस एक मामूली सा सवाल हूँ “साहिब..!और लोग कहते हैं.. तेरा... कोई जवाब नहीं....!!!!
^दर्द हल्का है,
साँस भारी है,जिए जाने की
रस्म जारी है...
^शौंक नहीं है मुझे अपने जज़्बातों को यूँ सरेआम लिखने का …मगर क्या करूँ ,
अब जरिया ही ये है तुझसे बात करने का..........


^एक मुट्ठी इश्क़ बिखेर दो  इस ज़मीन पे,बारिश का मौसम है शायद मोहब्बत पनप जाए।

मै रौशनी की तलाश मे कुछ.....

मै रौशनी की तलाश मे कुछ, बुझी मशालें जला रहा हूँ,
स॔भल के रहना अंधेरे वालों, मै अपना सूरज बना रहा हूँ,खरीददारों ये मत समझना, मयार मे मेरे कुछ कमी है,
तुम्हारी गुरबत को देख कर मै खुद अपनी कीमत घटा रहा हूँसुना है मैने कि आज कल वो, खुदा समझने लगे हैं खुद को,
अब उनके सजदे मे सर को अपने, मै झुक के रहना सिखा रहा हूँ,मेरी मुहब्बत या तेरी नफ़रत ये बाज़ी जीतेगा कौन देखें,
तू मूझ को खुद मे घटा रही है, मै तुझको खुद मे बढा रहा हूँ,अगर हवाओं को कोई शक है, तो हौसले मेरे आज़मा लें,
मै कितनी शिद्दत से आसमाँ मे कटी पतंगें उड़ा रहा हूँशिकस्तगी का जो दर्द था वो छुपा के सीने मे रख लिया है,
मै खुद तो हारा हुआ हूँ लेकिन जहाँ को हिम्मत बंधा रहा हूँ,तुझे भुलाया है जब से मैने अजब पसोपेश मे पड़ा हूँ
मै तुझ से दूरी बढा रहा हूँ या तेरे नज़दीक आ रहा हूँ!

बस चन्द करोड़ों सालों में सूरज की आग बुझेगी जब

बस चन्द करोड़ों सालों मेंसूरज की आग बुझेगी जबऔर राख उड़ेगी सूरज सेजब कोई चाँद न डूबेगाऔर कोई जमीं न उभरेगीतब ठंढा बुझा इक कोयला साटुकड़ा ये जमीं का घूमेगाभटका भटकामद्धम खकिसत्री रोशनी में!मैं सोचता हूँ उस वक्त अगरकागज़ पे लिखी इक नज़्म कहीं उड़ते उड़तेसूरज में गिरेतो सूरज फिर से जलने लगे!!

जब भी इस शहर में कमरे से मैं बाहर निकला मेरे स्वागत को हर इक जेब से ख़ंजर निकला l

जब भी इस शहर में कमरे से मैं बाहर निकला  मेरे स्वागत को हर इक जेब से ख़ंजर निकला l 
मेरे होंटों पे दुआ उस की ज़बाँ पे गाली  जिस के अंदर जो छुपा था वही बाहर निकला l
ज़िंदगी भर मैं जिसे देख कर इतराता रहा  मेरा सब रूप वो मिट्टी का धरोहर निकला l 
रूखी रोटी भी सदा बाँट के जिस ने खाई  वो भिकारी तो शहंशाहों से बढ़ कर निकला l 
 क्या अजब है यही इंसान का दिल भी 'नीरज'  मोम निकला ये कभी तो कभी पत्थर निकला l

अभी मोहब्बत नई-नई है!

ख़मोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई-नई है, अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई-नई है! 
अभी न आएगी नींद तुमको, अभी न हमको सुकूँ मिलेगा, अभी तो धड़केगा दिल ज़्यादा, अभी मुहब्बत नई नई है!
बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ, फ़ज़ा में खुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है! 
जो खानदानी रईस हैं वो मिजाज़ रखते हैं नर्म अपना, तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई-नई है!
ज़रा सा कुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में, अभी से उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है!
बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे है,ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिसकी ताक़त नई नई है!

कौन आएगा यहाँ कोई न आया होगा मेरा दरवाज़ा हवाओं ने हिलाया होगा

कौन आएगा यहाँ कोई न आया होगा  मेरा दरवाज़ा हवाओं ने हिलाया होगा 
दिल ए नादाँ न धड़क ऐ दिल ए नादाँ न धड़क  कोई ख़त ले के पड़ोसी के घर आया होगा 
 इस गुलिस्ताँ की यही रीत है ऐ शाख़ ए गुल  तूने जिस फूल को पाला वो पराया होगा 
 दिल की क़िस्मत ही में लिक्खा था अंधेरा शायद  वर्ना मस्जिद का दिया किस ने बुझाया होगा 
 गुल से लिपटी हुई तितली को गिरा कर देखो  आँधियो तुम ने दरख़्तों को गिराया होगा 
 खेलने के लिए बच्चे निकल आए होंगे  चाँद अब उस की गली में उतर आया होगा 
 कैफ़ परदेस में मत याद करो अपना मकाँ  अब के बारिश ने उसे तोड़ गिराया होगा!

बहुत पानी बरसता है तो मिट्टी बैठ जाती है ,

बहुत पानी बरसता है तो मिट्टी बैठ जाती है ,  न रोया कर बहुत रोने से छाती बैठ जाती है , यही मौसम था जब नंगे बदन छत पर टहलते थे, यही मौसम है अब सीने में सर्दी बैठ जाती है , चलो माना कि शहनाई मोहब्बत की निशानी है, मगर वो शख़्स जिसकी आ के बेटी बैठ जाती है,बढ़े बूढ़े कुएँ में नेकियाँ क्यों फेंक आते हैं ?कुएँ में छुप के क्यों आख़िर ये नेकी बैठ जाती है ?नक़ाब उलटे हुए गुलशन से वो जब भी गुज़रता है,समझ के फूल उसके लब पे तितली बैठ जाती है ,सियासत नफ़रतों का ज़ख्म भरने ही नहीं देती,जहाँ भरने पे आता है तो मक्खी बैठ जाती है ,वो दुश्मन ही सही आवाज़ दे उसको मोहब्बत से ,सलीक़े से बिठा कर देख हड्डी बैठ जाती है.

जो ऋतुओं की तक़दीर बदलते हैं वे कुछ-कुछ मिलते हैं वीरानों से

जो ऋतुओं की तक़दीर बदलते हैं वे कुछ-कुछ मिलते हैं वीरानों से दिल तो उनके होते हैं शबनम के सीने उनके बनते चट्टानों से हर सुख को हरजाई बन जाने दो, हर दु:ख को परछाई बन जाने दो, यदि ओढ़ लिया तुमने ख़ुद शीश कफ़न, क़ातिल का दिल घबरा ही जाएगा।  बूढ़े अंबर से... बूढ़े अंबर से माँगो मत पानी मत टेरो भिक्षुक को कहकर दानी धरती की तपन न हुई अगर कम तो सावन का मौसम आ ही जाएगा मिट्टी का तिल-तिलकर जलना ही तो उसका कंकड़ से कंचन होना है जलना है नहीं अगर जीवन में तो जीवन मरीज का एक बिछौना है अंगारों को मनमानी करने दो लपटों को हर शैतानी करने दो समझौता न कर लिया गर पतझर से आँगन फूलों से छा ही जाएगा।  बूढ़े अंबर से... वे ही मौसम को गीत बनाते जो मिज़राब पहनते हैं विपदाओं की हर ख़ुशी उन्हीं को दिल देती है जो पी जाते हर नाख़ुशी हवाओं की चिंता क्या जो टूटा हर सपना है परवाह नहीं जो विश्व न अपना है तुम ज़रा बाँसुरी में स्वर फूँको तो पपीहा दरवाजे गा ही जाएगा।  बूढ़े अंबर से... दुनिया क्या है, मौसम की खिड़की पर सपनों की चमकीली-सी चिलमन है, परदा गिर जाए तो निशि ही निशि है परदा उठ जाए तो दिन ही दिन है, मन के कमरों के…

कभी यूँ मिलें कोई मसलेहत, कोई ख़ौफ़ दिल में ज़रा न हो,

कभी यूँ मिलें कोई मसलेहत,कोई ख़ौफ़ दिल में ज़रा न हो, मुझे अपनी कोई ख़बर न हो! तुझे अपना कोई पता न हो वो फ़िराक़ हो या विसाल हो! तेरी याद महकेगी एक दिन वो ग़ुलाब बन के खिलेगा क्या,जो चिराग़ बन के जला न हो!  कभी धूप दे, कभी बदलियाँ, दिलो-जाँ से दोनों क़ुबूल हैं, मगर उस नगर में न क़ैद कर, जहाँ ज़िन्दगी का हवा न हो!  वो हज़ारों बाग़ों का बाग़ हो, तेरी बरक़तों की बहार से, जहाँ कोई शाख़ हरी न हो, जहाँ कोई फूल खिला न हो!  तेरे इख़्तियार में क्या नहीं, मुझे इस तरह से नवाज़ दे, यूँ दुआयें मेरी क़ुबूल हों, मेरे दिल में कोई दुआ न हो!  कभी हम भी जिस के क़रीब थे, दिलो-जाँ से बढ़कर अज़ीज़ थे, मगर आज ऐसे मिला है वो, कभी पहले जैसे मिला न हो!