रोशनी चाही थी, आग लगा दी किसने

रोशनी चाही थी, आग लगा दी किसने
मेरी नेकियों की, मुझे सज़ा दी किसने

राख के ढ़ेर में अमन पसरा था
बुझें अंगारों को फिर हवा दी किसने

चांद खामोश था, तारें झपकियां लेते हुए
खामोश रात में बिरहन की पीर जगा दी किसने

बुरा किया है किसी का, ना बुरा चाहा है
ना-करदा गुनाहों की सज़ा दी किसने

साफ-आसमां है, घर सैलाब में डूबा है
अश्कों की झड़ी लगा दी किसने

खामोश मुहब्बत, खामेशी से मिलते हैं
शहर भर में मुहब्बत की बात उड़ा दी किसने..